श्रम ब्यूरो
भारत सरकार

श्रम ब्यूरो की पृष्ठभूमि

भारत में श्रम सांख्यिकी का प्रारम्भ उस समय हुआ जब वर्ष 1872 में प्रथम राष्ट्रीय जनगणना की गई । इस जनगणना से केवल व्यक्तियों की संख्या का ही नहीं बल्कि लाभकारी नियोजितों की संख्या का भी पता लगाया गया । तभी से प्रत्येक जनगणना प्रति 10 वर्ष में विभिन्न उद्योगों तथा व्यवसायों में श्रमिकों पर लाभकारी आंकडे उपलब्ध करवाती है । जनगणना द्वारा रोजगार पर आंकडे उपलब्ध करवाने के अतिरिक्त, द्वितीय विश्वयुध्द तक श्रम-सांख्यिकी पर अन्य आंकड़े श्रम नीतियां बनाने हेतु नहीं बल्कि अधिकतर श्रम कानूनों के क्रियान्वयन के उपोत्पाद के रूप में तर् आधार पर एकत्रित किए जाते थे । 1931 में रोयल श्रम आयोग ने श्रम आंकड़ों के विधिवत् संग्रहण की आवश्यकता पर बल दिया । आयोग ने अनुभव किया कि नीति, तथ्यों के आधार पर बनाई जानी चाहिए क्योंकि तथ्यों की अनिश्चितता के कारण इसके उद्देश्य के संबंध में भ्रम तथा विवाद पैदा होता है । आयोग ने औद्योगिक श्रमिकों की निर्वाह, कार्यकारी तथा सामाजार्थिक स्थितियों के संबंध में सूचना एकत्रित तथा संकलित करने में सक्षम प्राधिकारी को सक्षम बनाने हेतु समुचित विधान अपनाने की सिफारिश की । द्वितीय विश्व युध्द की आरम्भिक अवधि के दौरान से ही मूल्य वृध्दि के दबाव के कारण श्रमिकों की मजदूरी में प्रतिपूर्ति की मांग उठी जिसमें मूल्यों में परिवर्तन का पता लगाने हेतु तंत्र की स्थापना की आवश्यकता पड़ी । तद्नुसार भारत सरकार ने मूल्यों में उतार-चढ़ाव को मापने के लिए सांख्यिकीय संगठन के प्रस्ताव हेतु श्रम विवाद अधिनियम, 1929 के तहत वर्ष 1940 में राउ कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी का गठन एवं स्थापना की गई । राउ कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी ने निर्वाह लागत में वृध्दि के कारण श्रमिकों की प्रतिपूर्ति दर का पता लगाने हेतु निर्वाह लागत सूचकांक के संकलन एवं रख-रखाव का सुझाव दिया ।

राउ कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी की सिफारिश पर पारिवारिक बजट जांच आयोजित करने तथा महत्वपूर्ण केन्द्रों के लिए देश में एकरूपता आधार पर निर्वाह लागत सूचकांक के संकलन के उद्देश्य से 1941 में शिमला में निर्वाह लागत निदेशालय की स्थापना हुई । निदेशालय ने वर्ष 1943-45 के दौरान जांच-पडताल की । तथापि द्वितीय विश्व युध्द के दौरान औद्योगिक संबंधों के क्षेत्र में सरकार के और अधिक हस्तक्षेप से श्रम आंकड़ों के विधिवत् संग्रहण तथा संसाधन की आवश्यकता को बल मिला । परिणामस्वरूप () कारखानों संबंधी मामलों () श्रम कल्याण एवं स्थितियों के कुछ विशेष क्षेत्रों पर आंकडों के संग्रहण को सरल बनाने हेतु 1942 में औद्योगिक सांख्यिकी अधिनियम बनाया गया । पुन: महत्वपूर्ण श्रम अधिनियमों जैसे श्रमिक संघ अधिनियम,1926, कारखाना अधिनियम,1948 तथा मजदूरी भुगतान अधिनियम,1936 आदि के कार्यान्वयन से प्राप्त आंकड़ों के संग्रहण एवं संसाधन के लिए प्रबन्ध किए गए । श्रम नीतियॉ बनाने के संदर्भ में और व्यापक श्रम आंकड़ों की आवश्यकता अनुभव की गई तथा इसी परिप्रेक्ष्य में 1 अक्तूबर,1946 में निर्वाह लागत निदेशालय का पुन: नामकरण करते हुए कार्यों में बढौतरी सहित श्रम ब्यूरो की स्थापना हुई । तभी से श्रम ब्यूरो अखिल भारतीय स्तर पर श्रम के विभिन्न पहलुओं पर आंकड़ों के संग्रहण, संकलन, विश्लेषण एवं वितरण में कार्यरत हैं ।